प्रकृति अथवा पर्यावरण से जुड़ने पर बच्चों में संस्कार बढ़ता है….

बोर्डिंग स्कूल और सामाजिक कार्यों से जुड़े रहने के कारण मेरा अधिकांश समय बच्चों के साथ ही व्यतीत होता है.अलग -अलग घरों से अलग -अलग स्वाभाव के बच्चे बोर्डिंग में आते हैं.कुछ पढाई में कमजोर होते है तो कुछ अंतर्मुखी स्वभाव के होते हैं.कुछ चुपके -चुपके शरारत करने वाले होते हैं तो कुछ दबंग होते हैं.सभी बच्चों को अपने -अपने स्तर से ठीक करने के लिए अलग -अलग उपाय लगाना पड़ता है.किन्तु बागवानी करने के लिए सिखाना एक ऐसा उपाय है मेरी नजर में जो सभी प्रकार के स्वाभाव के बच्चों को काफी हद तक अनुशासित कर देता है.मैं और मेरी शिक्षिकाओं ने बोर्डिंग के लगभग सभी बच्चों को बागवानी से बाँध दिया है.कोई बच्चा गमला में तो कोई बच्चा पेप्सी की बोतल में तो कोई बच्चा कैम्पस के किसी खाली पड़े हुए जगह पर कुछ न कुछ पौधे के बीज रोपकर फूल,फल सब्जी (पालक,लाल साग, बोदी, पपीता ,खीरा, अमरुद, गुलाब वगैरह )उगा रहा है.सभी बच्चे सुबह -शाम अपने लगाये हुए पौधे में पानी डालते हैं और रोज पौधे को बढ़ता हुआ देखकर खुश होते रहते हैं.
यानि की कई क्रिएटिव वर्क में बागवानी भी एक ऐसी कला है, जो बढ़ते हुए बच्चों को सकारात्मक दिशा देने में कारगर सिद्ध होती है.बस इस कला से बच्चों को जोड़ने के लिए थोड़ा प्रयास बड़ों को भी करना जरुरी होता है.

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